विविध

कब होई भोर - जनकदेव जनक

पहिलका झलक

समय-दुपहरिया
स्थान-सड़क के चउराहा

(पंक्तिबद्ध कलाकारन के दल अपना बैनर के साथे गोल वृत बनावत चुउराहा पर खड़ा बाड़ेंन. ओहमें से चार कलाकार अंधरा, बहिरा, लंगड़ा आ गूंगा के भूमिका में वृत के अंदर खडा होत बाड़ेंन. तबही अंधरा बहिरा के कान्हा पर बाया हाथ रख के एगो गीत गावत बाटे, जवना के लंगड़ा आ गूंगा धियान से सुनत बाड़ेंन. साथ ही आपन हाव ,भाव आ चेहरा के इंप्रेशन से ओकर अरथ समङो के कोशिश में परेशान बाड़ेंन. ) 
अंधा- अंधरिया के लउकत नइखे छोर,
ए गोइंया बोल होई कब अंजोर. 
अंखियां में भरल बाटे लोर..हो.ओ.,
ए भइया बोल होई कब भोर! 
गरहन के रतिया राहू के आतंक, 
चान के अंजोरिया बिना जगत बाटे सून.
पसरल गदबेरवा चलत नइखे जोर.हो .ओ.
ए भइया बोल होई कब भोर! 
दिअरी उदास बाड़ी रूसल बाड़ें बाती,
तेल बिन रोशनी के केहूं ना संघाती.
गवें गवें उठता मनवा में हिलार.हो .ओ..
ए भइया बोल होई कब भोर!
कोहराइल धरमावा बा फुटल करमावां, 
कइसे उजागर होई सांचल सपनवां.
होते भिंनुसार उठे चिरई के शोर.हो.ओ..
ए भइया बोल होई कब भोर!
(गीत के अंत में अंधरा बोलता) 
अंधा-कब होई भोर भइया कब होई भोर !
बहिरा- का बोलल बाड़, तनी जोर से बोल ?(अपना कान में अंगुरी डाल के अंधरा के झकझोड़त बोलत बा) 
अंधा- कब होई भोर भइया कब होई भोर !(तीन बार)
(लंगड़ा के साथे खड़ा गूंगा अंधरा के बात सुन के लंगड़ा के हुदकावत आ इशारा से पूछत बा कि उ का कहे के चाहत बा. अंधरा के बात के जबाब द)
गूंगा-आ.आ.आ (अंधरा के ओर इशारा करत) 
लंगड़ा- (इशारा से लंगड़ा के चुप करावत कान पर हाथ रख के बात सुने के प्रयास करत बाटे.)
अंधा-भइया, कब होई भोर, भइया कब होई भोर ! कब होई भोर!
गूंगा-आ..आ.आ..
लंगड़ा-(जोर से चीखता) चुप चुप चुप !!! जब टिमटिमात दीया सुरूज के आपन रोशनी उधार दिही , तब होई भोर भइया, तब होई भोर...!
(एकरा बाद सब कलाकार थपरी बजावत वृत पर चक्कर लगावत घुमे लागता लोग आ अंधरा अंधरिया के लउकत नइखे छोर..गीत गावत नेपथ्य में चल जाता )

दुसरका झलक

समय-सांझ
स्थान-सड़क के चउराहा

(आतंकवादी के भूमिका में पांच कलाकार वृत के अंदर आवत बाड़ेंन. ओहमें से एगो गैंगस्टार आ बाकी सहयोगी संघतिया बाड़ें. ओकनी के प्लान भरल बस के यात्रियन के अगवा करे के बा.) 
गैंगस्टर:- (नंबर एक से) सामने से एगो यात्री बास आवे वाला बिया. ओकरा में कुछ आदमी हमनी के काम के बाड़ें. देख, बस आ रहल बिया. जल्दी जाके सड़क के बीचों बीच सुत जा. बाकी आतंकी लोग झाड़ी में छुप जा. बस के खड़ा होते यात्रियन के उतार के किडनेप कर लेवे के बा. सभे जल्दी यहां से मोरचा के तइयारी में जुट लोग.
(हार्न बजावत बस आवत बिया. बार बार हार्न बजावला से सड़क पर सुतल आदमी नइखे उठत त बस नजदीक आके रूक जात बिया. बस ड्राइवर नीचे उतर के आदमी के पास जाता )
ड्राइवर
:-
 ए भाई, सड़क पर काहे सुतल बाड़, आरे उठ उठ. बहिरा सांप काहे बनल बाड़. सुनत बाड़ कि ना हो..
नंबर एक
:-
 (सुतल आदमी फुरती से उठल आ रिवाल्वर तान के बोलल) तोहार अकिल घास चरे गइल बिया. अब देख तानी बहिरा सांप के कमाल..
(आतंकी बंदूक तान के बस के घेर लेत बाडेंन) 
गैंगस्टर
:- 
ड्राइवर, बिना चलाकी कइले सब लोग के बस से नीचे उतार दे, ना त तोरे जान पर आफत आई. का बुझले. आरे नंबर एक , दु ,तीन, चार, ताक मत.. आपना काम पर टूट पड़..बस से यात्रियन के जल्दी उतार..जल्दी ..
(आतंकी बस खाली कराके हटा देत बाड़ेंन. गैंगस्टार अब चउराहा पर यात्रियन के लाइन में खड़ा होके के कहत बा)
गैंगस्टर
:-
 बस यात्री लाइन में खड़ा हो जा लोग...कवनों तरह के चलाकी देखावे के जरूरत नइखे..ना ..त..
पहिल यात्री
:-
 ना त का कर लेब! 
गैंगस्टर
:- 
(बंदूक से एगो गोली चलावत) धांय! हम कसाई हई..केहूं के दोबारा बोले के मउका ना ना देनी..
पहिल यात्री- हे राम! (अतना बोलत उ जमीन पर गिर के तड़पता)
दुसरका यात्री
:-
 हमनी जइसन निरीह परानी के जान मारला से तोहरा लोग के का मिली..?
गैंगस्टार
:- 
तोहनी के निक्कमी सरकर हमरा खास आदमियन के जेहर में डाल के रखले बिया..(अतना बोल के गोली दाग देता) धांय!!
दुसरका 

यात्री
:-
 ला .इल्लाह..इनल्लाह..मोहम्मद ..रसुल अल्लाह !(यात्री जमीन पर गिर कर मर जाता)
तीसरका 

यात्री
-आरे ,गोली मारहीं के बा त सरकार के मार लोग..हमनी के काहे मारत बार लोग..?
गैंगस्टार:- ना समझ यात्री,.. ई जनता के सरकार ह..जनता मरी त सरकार हिली..(ओकरों के गोली मार देता) धांय!!!
तीसरका यात्री

:- 
वाहे गुरु .. सत् ..श्री ..अकाल..(जमीन पर गिरके तड़पत शांत हो जाता) 
चउथा यात्री- आरे ओ इंसानियत के दुश्मन ..डरे के बा त कानून से डर..कोर्ट के इंसाफ से डर..चिर निन्ह में सुतल एह जनता से डर.., जवना दिन ई सुतल जनता जाग जाई ..ओह दिन तोहनी पर कयामत आ जाई कयामत..
गैंगस्टर-(अटहास करत) आरे ओ यात्री..जवना देश में बहिरी सरकार होखे..जहवां अंधरा कानून बाटे.. लंगड़ा इंसाफ बा..ओह देश के गूंगी जनता का कर सकत बिया.. का..आक ..थूं..(ओकरा देह पर थूकत गोली मार देता) धांय !!!!
चउथा यात्री

:-
 ओ गौड.. माफ कर दिह..एकनी के दिमाग फ्यूज कर गइल बा..जमीर मर गइल बा..(जमीन पर गिरके तड़पता) 
गैंरस्टर
:-
 (मारे खुशी के खूब जोर जोर से हंसता) हा.हा..हा..हो.हो..हो,हूं.हूं.
हूं 
(गोली के आवाज सुनके चउराहा पर जनता के भीड़ उमड़ आवता.लहू लुहान यात्रियन के देख के सभकर खून खौल उठता. नेपथ्य से मारो..मारो. मारो..के आवाज उठता, आतंकियन पर लोग टूट पड़त बा. बंदूक छीन लेता.तभी पुलिस के वाहन आवता) 
एक बार फेरू सब कलाकार वृत पर चक्कर लगावत बाड़ें. आगे आगे अंधरा उहे गीत गावत चलत बा.पीछे पीछे सब कलाकार नेपथ्य के तरफ बढ़त बाड़ें. 
(पटाक्षेप)

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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद, झारखंड(भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244



अंक - 55 (24 नवम्बर 2015)

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