संपादकीय

सावन सूतल भागल भादो - कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’

सावन सूतल भागल भादो, शरद शुभ आइल हे!

बुलुकि-बुलुकि रोइ के बदरा चुपाइल,
नदी-ताल-तलइयन के ओठा झुराइल।
झँखत झिंगुरवा कोना अँतरा लुकाइल,
कास बुढ़ाइल हे, घरद शुभ आइल हे!

उगल अगस्त आ आकाश अगराइल,
उतरलि खँड़लिच, मोरवा लुकाइल।
चिहुकि चकइया चितवे, चकवा चिहाइल,
चान मुसकाइल हे, शरद शुभ आइल हे!

राह आ घाट छेंकल, छोड़लस पानी,
लेति बा हिलोर जल में पुरइनि रानी।
अंग-अंग मातल रस में झुमति बा जवानी,
कमल फुलाइल हे, शरद शुभ आइल हे!

खटे में ना खेतिहर कइले बाड़े खोटी,
धानवाँ पहिरि झुमे धानी रंग धोती
घसियन का पतइन पर झुले लागल मोती,
सरग सिहाइल हे, शरद शुभ आइल हे!
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- कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’
अंक - 51 (27 अक्टूबर 2015)

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