संपादकीय

बाटे बेटी के बियहवा - धरीक्षण मिश्र

कइसन घर बर मिली कहाँ से धन दहेज के आयी।
कइसन मिलिहें सासु ननद जहवाँ बेटी बियहायी।
भारी चिन्ता एगो माथापर सवार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

केतने सोर्स लगाके टीपन गैल दुचारि मँगावल।
लेकिन सगरे व्यर्थ भइल गनना जब बइठि न पावल।
फेरु से देखे के अब दोसरे दुवार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

गगना कहीं बनल तब बेटिहा धावल उहवाँ गइले।
आ बेटहा मालिक का गोड़े पर जा के भहरइले।
बेटिहा मुलजिम भइले बेटहा थानेदार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

बेटहा सोचले कि हम एतना धनिक और खन्दानी।
इनका बेटी से जब आपन बेटा बियहत बानीं।
त हमरे हाथे इनके भारी उपकार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

जेतना बेटहा मँगले ओतना बेटिहा सजी सकरले 
नाकुर-नुकुर ना कुछ कइले जिउ का ज्यादे जरले।
सिंह का आगे डर का मारे चुप सियार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

भइल बरच्छा तिलक चढ़ल भारी बरियात सजाइल।
सोमनाथ के लूटे मनु महमूद गजनवी आइल।
बेटिहा मंदिर के पुजारी सम लाचार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

पहिली रात बरात समूचा बिना मनावल खाइल।
पर माँग बेटहा के भर के कन्या के माँग भराइल।
लगभग आधा सागर बेटिहा अबतक पार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

बेटहा पनही में होला कड़ियलपन के अधिकाई।
बेटिहा तब सोचे लागेला कइसे ऊ नरमाई।
बिहाने तेल भेजल तब जरूरी कार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

बेटहा पनही में जो होई बहुते अधिक कड़ाई।
तब मानल बात हवे कि बेटिहा ना तनिको चलि पाई।
रस्ता अइसन बा बियाह के काँटेदार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

धीरे-धीरे तेल मलत ऊ सगरे तेल ओराइल।
लेकिन ना जाने कि काहें तनिको ना नरमाइल।
उलटे बेटिहा के पद काटे के लगार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

धोती बेटिहा का घर से जब आइल तबे नहइले।
एही धोती का भरोस पर बेटहा घर से अइले।
धोती पइते ना तS रहीते ऊ उधार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

लाठी भाला बरछी बनूखि आ मोटर घोड़ा हाथी।
हीत नात परिवार निजी आ सब अधिकाजन साथी।
जनवासा सेना के पड़ाव उजियार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

बिजयी सेना में अब उत्सव होखे लागल भारी।
छूटे लागल बाढ़ि और सब नाचरंग भी जारी।
सेना वीर पान कइल आ मदार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

दुसरी रात भात खाये के बात सुने ना चाहें।
देखते अगुवा आ बेटिहा के बरिस परें अगताहें।
बेटहा का हाई टेम्प्रेचर के बुखार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

रामबाण रुपया इन्जेक्शन देके जर उतराइल।
तब कइसों उनका एक थरिया बारा भात घोटाइल।
तब तक राति बीते लागल भिनुसार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

तिसरा दिनें बिहाने बेटिहा धरती बान्हे धइले।
तब बेटहा समधी मड़वा के बान्हा खोले गइले।
बिदा होत में बरात खुँटा उजार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

अब से बेटिहा का सब दिन नइ के परी रहे के।
बेटिहा कुल का बेटहा कुल के बाटे रोब सहेके।
किनल गुलाम अब से बेटिहा सपरिवार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

जनम मरन में आ बिआह में जब जब बेटहा आई।
तब-तब बेटिहा का जरूर देबे के परी बिदायी।
सब दिन लूटे खातिर बेटहा का सुतार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

केतने लड़की कम दहेज में ससुरा में चलि अइलि।
तब उहाँ सासु द्वारा ऊ एतना अधिक सतावल गइली।
कि आत्महत्या कैले साँसति से उबार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

कई सासु अपना पतोहि के अपने करे जरावें।
आ चूल्हा बारत के दुर्घटना कहिके गाल बजावें।
आँसू बरसे मनवाँ हरसे चेतल कार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

"रानी हमार का भइली आइल कवन नगरिया लूटे।"
कहि-कहि गिरें और मूर्छा के तार कबे ना टूटे।
जगत में जाहिर माहिर सासु के दुलार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

सेवा के उपदेश बधू के सगरे लोग सुनावे।
ओकर का अधिकार हवे ई बात न किन्तु बतावे।
मानों सेवा में बिलीन ओकर अधिकार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

केतने लोग दहेज बिरोधी भाषण खूब सुनावें।
लेकिन अपने बेटहा बने त ओके हटा न पावें।
ई दहेजवा जमनछव के कास्तकार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

यद्यपि दोष दहेज प्रथा में कहल गइल बा ज्यादा।
लेकिन एके तूरे के ना भइल इरादा वादा।
पहिले आगे चले के ना केहु तइयार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

पारा पारी ई दहेज दुख सबका परत कपारे।
पर दहेज के करत उलंघन सबके हिम्मत हारे।
ई दहेजवा मानों चीन के दीवार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

कई बार सरकारो एके तूरे के सरियइल।
तब मेन गेट तजि बैक डोर से चुपके से चलि आइल।
हार मानि अब चुपचाप बा सरकार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥

दहेजवा जादू के बा भारी एगो खेल हो गइल।
एकरा आगे सबके अक्किल बाटे फेल हो गइल।
कवनों लउकत ना उपाय बा अन्हार हो गइल।
बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल॥
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लेखक परिचय:-

नाम: धरीक्षण मिश्र 
जनम: 1901 बरियारपुर, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश 
मरन: 24 अक्टूबर 1997 
गीतकार, नाटककार अउरी गायक 
रचना: कागज के मदारी, अंलकार दर्पण, काव्य दर्पण, काव्य मंजूषा अउरी काव्य पीयूष आदि 
सम्मान: भाषा सम्मान (साहित्य अकादमी, दिल्ली), सेतु सम्मान (विश्व भोजपुरी सम्मेलन) 
अउरी भोजपुरी रत्न (अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद) आदि 
अंक - 50 (20 अक्टूबर 2015)

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