संपादकीय

सुतल पाठक - डाo उमेशजी ओझा

राउरा नाया-नाया लिखे शुरु कईले बानी। कवनो बात नइखे। राउर लिखल केहु नइखे पढत ओसे आपन लिखल बन मत करी। एकर मतलब ई नइखे कि रउरा लिखे नइखे आवत। जिनगी एगो लमहर पाठशाला हऽ जवना में आखिरी सांस तकले कुछुओ ना कुछुओ अदिमी सीखते रहेला। जीवन में असफलता आ ओकर अपमान के अनुभव कइल बहुत मंहग बा। ई आदमी के रीढ के बरिआर करेला। एक हाली जे ए आगी से पार हो जाई ओकरा के कवनो घटना आपन रहता से हटा नइखे सकत। 
अबही के दउर में भोजपुरी साहित्य के लेखक के सोझा एगो बडऽहन समस्या आ गइल बा। भोजपुरी साहित्य कऽ कईगो पत्रिका छपत बाडीस, साहित्य भी छप रहल बा। बाकि साहित्य के कवनो असर भोजपुरिया लोगन प नइखे लउकत। हमनी के सोचे के चाही कि भोजपुरी साहित्य काँहे प्रभावहीन हो गइल बा। पहिले सहित्य अउर कला में कवनो चीज शामिल होत रहे तऽ उ कला के रुप में ओकर असर लउकत रहे। समाज के विचार अउर विमर्स में असर लउकत रहे। 
पिछला कई बरिसन में आम आदमी में बडी तेजी से अधीरता के विकास भइल बा। पढे वाला सुतल बाडन अउरी लेखक आपना लिखला के लेके अधीर बाडन। आपन लिखला के जल्दिये जस चाहत बाडन। जवना के साहित्य के नया अग्नि-परीक्षा कह सकत बानी। एकरा में घीव के काम कइले बा सुतल पाठक। आ पाठक के सुतल उनकर मानसिक अवस्था के बनावे में सबसे बडहन काम कइले बा मिडिया। उहे रचना ज्यादा पढल जात बा जवन गंभीर नइखे। गंभीर रचना के पाठक कम होत जात बाड़न। एकर बडहन असर साहित्य पर पड़ल जाता बा। साहित्यक पत्रिकन के पाठक कम भइल बाडन। जवना में आसान लेख के मांग बढल बा। आजु के लिखनहारन कऽ बडहन भाग जेवन बुध्दिजीवी कहवावेला खासकर मीडिया कऽ, एगो बेचैन आत्मा निहन, एने से ओने हवाई जहाज लेखा मडारात लउतक बाड़े। आजू अईसन लेखक बनत बाडन जे हर तरह के समझौता करेके तइयार बाड़न। ओकर दुष्परिणाम के महसूस कइले नइखन चाहत। बस साहित्य में एके चीज खोजत बाड़न पइसा। बाकि उहो नइखे मिलत।
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लेखक परिचय:-

                                                   नाम: डाo उमेशजी ओझा
पत्रकारिता वर्ष १९९० से औरी झारखण्ड सरकार में कार्यरत
कईगो पत्रिकन में कहानी औरी लेख छपल बा
संपर्क:-
हो.न.-३९ डिमना बस्ती
                                                    डिमना रोड मानगो
पूर्वी सिंघ्भुम जमशेदपुर, झारखण्ड-८३१०१८
ई-मेल: kishenjiumesh@gmail.com
मोबाइल नं:- 9431347437
अंक - 47 (29 सितम्बर 2015)

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