संपादकीय

मैना - गोरख पाण्डेय

एक दिन राजा मरले आसमान में ऊड़त मैना
बान्हि के घरे ले अइले मैना ना

एकरे पिछले जनम के करम
कइलीं हम सिकार के धरम
राजा कहें कुँवर से अब तू लेके खेलऽ मैना
देखऽ कतना सुंदर मैना ना

खेले लगले राजकुमार
उनके मन में बसल सिकार
पहिले पाँखि कतरि के कहले अब तू उड़ि जा मैना
मेहनत कइ के उड़ि जा मैना ना

पाँखि बिना के उड़े पाय
कुँवर के मन में गुस्‍सा छाय
तब फिर टाँग तूरि के कहले अब तू नाचऽ मैना
ठुमुकि-ठुमुकि के नाचऽ मैना ना

पाँव बिना के नाचे पाय
कुँवर जी गइले अब बउराय
तब फिर गला दबा के कहले अब तू गावऽ मैना
प्रेम से मीठा गावऽ मैना ना

मरिके कइसे गावे पाय
कुँवर जी राजा के बुलवाय
कहले, बड़ा दुष्‍ट बा, एको बात न माने मैना
सारा खेल बिगाड़े मैना ना

जबले खून पियल ना जाय
तबले कवनो काम न आय
राजा कहें कि सीखऽ कइसे चूसल जाई मैना
कइसे स्‍वाद बढ़ाई मैना ना


अंक - 44 (8 सितम्बर 2015)

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