संपादकीय

जेठ भाई के निहोरा - डॅा० जयकान्त सिंह ' जय '

करS जन अनेत नेत, बबुआ सुधारS सुनS 
तूँही ना ई कहS काहे होला रोजे रगड़ा।
आपन कमालS खालS, एन्हूँ बा उहे
हालS आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा।।

चूल्हे नू बँटाला कहीं, इज्जतो बँटाला बोलS
ओठ सी के सुनS आजो ओही के जोगाइले।
भूँजा फांकी-फांकी पाँखी दिहली जो तोहरा के
जहाँ रहS फूलS फलS इहे गोहराइले।
बबुआ तूँ नीख खूब दिहलS बूढ़ारी में ई
टोक दीं त होई महाभारते नू तगड़ा।।

अपना ओह कइला के कइलीं का खोजी कबो
धके हाथ छाती पर तूँहीं खुद कहना।
अपने के देखS सुनS,हमरा के छोड़ बाबू
जीअ ताड़S सुख से त खुशी मने रहना।
कहिहS निधड़के जो, काम पड़े हमरा से
आजो ना कुनेत नेत भाई भले बगड़ा।।

खेतवा में खटि खटि, खूनवा जराईं सोचीं
भाई पढ़ जाई दुख आई ना ई पँजरा।
दुनिया जो देखी-सुनी, दिन दशा हमनी के
नजर मिलाई का लगाई मुँहे कजरा।
साँचो आज साँच लागे, सपना ना साँच होला
तबहूँ तोपिले जे ना पीटे केहू नगड़ा।।

तोहरा में बोलीले जे, हमरा में पारS भाँजी 
आभी-गाभी मारेलS त हम का ना बुझीले।
इरखा करीं ना कबो, पाछ ना छोड़ेलS तबो 
भागिले बचाके जान अपने से जुझिले।
तब काहे हमरा से टेंट तूँ बेसाहS ताड़S
झूठ-मूठ काहे के लगावS रोजे लफड़ा।।

जेही पार लगलें बनवलीं, बिगड़लीं ना
कइसे के बिधना हमार ऊ बिगड़िहें।
हँकलीं ना माल कबो, केहू के जिरात में त 
भला अनसोहात केहू काहे मोर लसरिहें।
अटल ई आस बिस्वास बाटे कान दीहS
जुड़ी नाहीं घीव त ना घटी कबो अँखड़ा।।

धने धन बाटे मन, सुख से जिएलS सुनी, 
रहितS बेकार त कपारे नू खइतS।
पेट काटी जेठ के धरम जो ना रखितीं त
हेंग नानू हमरा के आँखि तूँ देखइतS।
धन के बढ़ल नीक, मन बढ़ी करी दीक
मनवा के धनवा, ना टिके जन अगड़ा।।
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लेखक परिचय:-

नाम: डॅा० जयकान्त सिंह 'जय'
जनम: 1 नवम्बर 1969, मशरक बिहार
बेवसाय: भोजपुरी विभागाध्यक्ष 
एल एस कॉलेज, मुजफ्फरपुर, बिहार









अंक - 46 (22 सितम्बर 2015)

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