संपादकीय

जब गुजरीं तोहरा गाँव से - डॅा० जयकान्त सिंह 'जय'

नागिन बन के डंसे डगरिया
धरती खसके पाँव से, 

जब गुजरीं तोहरा गाँव से॥

छुपी कबले करुण कहानी 
खोली राज जमाना
मंजिल तक जो ना पहुँचब 
ई दुनिया मारी ताना
जब जब बइठल सोचीं सहमे
मनवा एही भाव से॥

जेतने दरद दबाईं दिल के
नेहिया पनपत जाले
देखीं कली के संग भँवरा ई
रहा रहा जियरा साले
हियरा हहरे हवले हवले
तोहरा ए अलगाव से॥

महक उठेला मन मंदिर में
प्रीतन के धूप काठी
हमरा तोहरा रुप गुण के
ई अंतर कब पाटी
जब जब गुजरीं तोहर नगरी
निरखीं नीके चाव से॥

सोना चंदन चान के टुकड़ा
कोइल के अस बोली
देहिया चितवा चमके चेहरा
याद पड़े हमजोली
नि:स्वारथ जो प्रेम ई पनके
चैन चोरावे दाव से॥

जयकवि कइसे दिल दरिया के
उठत ज्वार दबइहें
रूह जो रोवे केहू न जाने
कइसे नयन छुपइहें
धरम धरोहर करम कमाई
तोहरे लगन लगाव से॥
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लेखक परिचय:-


नाम: डॅा० जयकान्त सिंह 'जय'
जनम: 1 नवम्बर 1969, मशरक, बिहार
बेवसाय: भोजपुरी विभागाध्यक्ष 
एल एस कॉलेज, मुजफ्फरपुर, बिहार




अंक - 47 (29 सितम्बर 2015)

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