संपादकीय

अतना से हो जाई? - प्रशान्त पाण्डेय

रमेश के गाँव से तीन किलोमीटर पर लेखपाल के आफिस रहे. लेकिन जेठ के दुपहरिया आ ओपर पंचर टायर; आज ऊ दूरी तीस किलोमीटर लागत रहे. गमछा के फेंटा से आपन मूड़ी आ मुँह तs बाँध ले ले रहन, लेकिन सूरज सीधे कपारे पर आ के जरावत रहे. 
रस्ता में पंचर के दू गो दोकान भी रहे, लेकिन अतना गर्मी में मय गोड़ा बंद कई के घरे चल गइल रहन सs. खैर, मोटरसाइकिल घींचत-घींचत अब आफिस खाली १०० मीटर अवरू रह गइल रहे. 
आफिस के हाता में घुसलन, तs देखs तरन की लेखपाल के पुरनकी जिपवा फेर ख़राब हो गइल रहे. एगो मिस्त्री आ लेखपाल के ड्राइवर के अलावा के केहू दिखाई ना देत रहे. रमेश के नजर आफिस के नेमप्लेट पर गइल. लिखल रहे: मेवालाल मौर्या, लेखपाल। 
अंदर झंकलस। मौर्या सीट पर बइठल कूलर के हवा में ऊंघात रहन। 
"साहेब?…साहेssब?… मौर्या जी," रमेश बोललस; आवाज धीरे-धीरे बढ़ावत जात रहे. 
"हं.…कौन?" मौर्याजी आधा ऊंघात, आधा हड़बड़ात बोललन।
"हम हईं," 
"अरे, के हम?! गमछा हटावs, चाहे नाम बोलs!"
"हम हईं रमेश," रमेश कहलस अऊर गमछो हटा दिहलस।
"तू फेर आ गइले?"
"का करीं साहेब! रउवां जानते बानी। एक बिगहा खेत के पीछे हमार बाबूजी आ चाचा पागल भइल बाड़न. रऊँवा ओकर फैसला करवा देतीं तs दुन्नो परिवार सांती से जीहित खाइत,"
"फेर तोर कहानी चालू? कई हाली तें ईहे बात हमरा से कहले बाड़े, आ कई हाली हम तोहरा से कहले बानी की हम एमे कुछ ना कई सकेलें,"
"मौर्या जी, रऊँवा साहेब हईं. रऊँवा चाह देब तब सब हो जाई,"
"तें कब बुझबे? जब हम तोरा बाप के तैयार करनी समझौता खातिर, तs तोर चाचा एस डी एम साहब किहाँ अर्जी डाल देला। तोर चाचा के समझावs, तs तहार बाप लागेलन क़ानून छांटें। तs भैय्या, अइसन बा जे ई मय परिवार के हाल बा. ई पगलन के बीच में तें तनी समझदार लागेले, एही से तोर बात सुन लेवीं ले. बाकी ३० साल के नौकरी में हम आज ले झगड़े देखनी,”
रमेश अचानके मौर्याजी के गोड़ पर गिर गइल. सिसकारी ले के रोवे लागल. 
दू-चार सेकेण्ड तs मौर्याजी अकबकाईल देखत रहन। 
"उठ, उठ.....कई हाली से तें हमरा इहाँ आवs तरे?"
"छौ महीना में पनरह हाली तs होइये गइल होई," रमेश अभियो रोवते रहे।
"चुप हो जो, कुछ सोचे दे?"
मौर्या जी के ३० साल के नौकरी में आज पहिला बार कुछ अइसन होत रहे जेकरा से ऊ खुदे परिचित ना रहन।
उनकरा गोड़ पर गिरे वाला के कमी कबो ना रहे. उनकरा के "साहेब" कहे वाला के कमी कबो ना रहे. उनकरा के "माई-बाप" समझे वाला के कमी कबो ना रहे. 
सैकड़न गाँव वाला उनकरा के क़ानून के अंतिम दूत जानs सs. ऊ जौन समझा देस, तौन 
एस डी एम
 आ 
ए डी एम
, आ कई गो 
डी एम
 साहेब लोग के काटे मान के ना रहे. 
"काहें से की कौन पेंच कहाँ फँसल बा ऊ हमरे मालूम बा, काहें से पेंचवा तs हमहीं फँसईंले बानी," आपन लोग के बीच कह के खूब हंसस। 
कायदे से उनकर ट्रांसफर कहिये हो जाए के चाहत रहे. लेकिन अतना भौकाल बना ले ले रहलन, की ट्रांसफर हो हो के केंसिल हो जाए. साफ़-साफ़ ADM साहेब से कहि आवस की घर इंहवें बन गईल बा, बच्चा कुल पब्लिक स्कूल में पढ़तs तरन सs, हम बाहर कइसे जाईं? 
एस डी एम
 साहेब लोग इनकर घर में दावत खाए से लजास लोग. अइसन आलीशान घर की बड़का-बड़का बिजनेसमैन पानी भरस. 
एस डी एम
 के, 
ए डी एम
 के, पूरा जिला के, जवार के -- केकरा ना मालूम रहे की ई घर खातिर पइसा कहाँ से आइल! लेकिन केहू कबो बोले ना. जे ढेर बोले ओकरा के कुछ हिस्सा में से दे देस. बाकी "उपरो देवे के पड़ेला" के नाम पर लोग के देंह पर धोती छोड़ देस ईहे बहुत रहे!
लेकिन एगो इंसान रहे जे कर बात कई हाली मौर्याजी के अंदर से हिला दे. 
उनकर मेहरारू। 
ऊ अइसे कुछऊ ना बोलस। लेकिन कबो कबो धीरे से कहस -- "अतना लोग के हाय ना ले वे के चाहीं". अक्सर पूजा पाठ करत रहस. मौर्याजी कबो पूछ देस की "काहें अतना भक्ती देखावेलू", तs कहस की "रउरा ग्रह काटे खातिर।" मौर्याजी कबो डाँट देस, तs कबो चुप रहि जास. 
ऊपर से तs मौर्याजी अपना हिसाब से धाकड़ आदमी रहन। लेकिन कुछेक बात रहे, जे कबो कबो उनकरा अंदर "डाउट" पैदा कई दे. जइसे की उनकर मेहरारू के बात.
आज, जब उनकरा आफिस में ना बाबू रहे, ना चपरासी, ना फरियादी…खाली एगो याचक…बुझाइल जे उनकर मेहरारू कुछ उनकरा से कहsतरी… ऊ खाली, टूटत-ढहत आफिस में उनकर अधिकारी वाला रौब देखे खातिर आज केहु ना रहे. पंखा घरघरात रहे और रमेश रहि-रहि के सिसकारी लेत रहे. ना जाने कइसे, लेकिन आज कुछे देर खातिर ऊ इंसान बन गइल रहन। 
धीरे-धीरे बोलल चालू कइलन…
"देख.…तोर बाबूजी तोर चाचा के एक बिगहा में आधा बिगहा दे वे तैयार नइखन। हमरा के पइसा ऊहे खियइलन। हम चिट्ठी पत्री कई के लिख देनीं की कुल जमीन उनकरे हs. तब तोर चाचा 
एस डी एम 
साहब किहाँ चल गइलन। 
एस डी एम
 साहब हमरा से जब रिपोर्ट मंगलन तs तहार चाचा से हम अऊरू पइसा अईंठनी। ई सिलसिला चलत रहल," 
"तs?… "
"तs ई की हमरा कहला से दुन्नो कबो ना मनिहन सs,"
"तब?"
"घरे जो! तोर मोबाइल नंबर दे दे. हमरा कुछ बुझाई, तs तोरा के बताइब," 
"लेकिन,"
"घबरो मत. हम कहि देनी की तोर मामला सॉल्व हो जाई, तs सॉल्व हो जाई,"
"मौर्याजी, आपके बहुत एहसान रही. ई जान जाईं, की अगर एक महीना अऊरू देर हो गईल तs गोली चल जाई. आ एक बार सुरु हो गइल....."
"जो, जो..... अच्छा-अच्छा सोचे के चाहीं,"
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मौर्याजी के बुझाते ना रहे. 
फेर मौर्याजी के याद आइल की जब ऊ छोट रहन तs पांच-दस गाँव में एगो मिडिल स्कूल रहे. हो न हो रमेश के बाबूजी भी ओही स्कूल में पढ़ल होइहें। रमेश के फ़ोन लगइलन, तs अंदाजा सही निकलल। 
ओ स्कूल में एगो मास्टरजी रहन। अब तs नब्बे पहुंचत होइहन। उनकर पूरा जवार में बहुत इज्जत रहे. कबो लइकन के मारस ना. लेकिन तबो लइका कुल उनकर बात कबो काटस ना. कुछ अइसन प्रभावे रहे उनकर। पता कइला पर पता चलल की अभियो बोले बतियावे में तs दिक्कत ना रहे लेकिन पैर में लकवा के सिकायित रहे. 
मौर्याजी ऊ मास्टरजी के गाँव गइलन। उनकरा गोड़ पर गिरलन। आपन पूरा कच्चा चिटठा खोललन, पूरा मामला बतइलन, अपना गलती के माफी मंगलन। तब जा के चिरौरी कइलन की उनकरा साथे चल के आपन पुरान छात्रन के समझावस न तs खून खराबा हो सकेला। मास्टरजी कठजीव तs नाहिये रहन, गोली-बन्दूक के बात सुनलन तs एकदम तइयार हो गइलन। 
अपना गाड़ी में मौर्याजी मास्टरजी के ले के अगिला सुबह सीधे रमेश के बाबूजी के घर धमक गइलन। रमेश के चाचा भी बगले में रहत रहन, ऊहो आ गइलन। 
दुन्नो के बुझाते न रहे -- का कहीं, का करीं? 
"देखs, अब सोचे के कुछ बाँचल नइखे। मामला साफ़-साफ़ बा. अब तक जौन भइल, तौन भइल. मास्टरजी तहरा लोग के सामने बाड़न। अगर रचिको इनकर इज्जत तहँ लोग करे लs, तs इनकर "किरिया खा लोग की आपस में आधा-आधा जमीन बाँट के चैन से रहबs लोग"
गाँव में अइसहीं हड़कम्प मचल रहे. लेखपाल साहब मास्टरजी के ले के काहें आइल बाड़न?
रमेश के बाबूजी आ चाचा के कुछ बुझाते न रहे. "बाबूजी! चाचा! का सोचs तsरs लोग. ई जान ल भगवान साक्षात आइल बाड़न मास्टरजी के रूप में. ई मौका गइल, तs दुन्नो जाना अऊर दुन्नो जाना के परिवार बुझ लs की जेले में जिंदगी बितायी," रमेश कहलस. 
बाबूजी आ चाचा बूझ गइलन की भलाई एही में बा. मास्टरजी के गोड़ छू के जमीन के झगड़ा खतम भइल. मास्टरजी भी एकदम विभोर हो गइलन। ई ऊमिर में आपन उपयोगिता रहे; एले ढेर का चाही जिंदगी में!
तय भइल की सब मंदिर में जा के भगवान के भोग लगाई। 
मंदिर में परसाद बंटत रहे, तलहीं एगो जवान मौर्याजी के धई लेलस।
"लेखपाल साहेब, जब आप अतना अच्छा काम कई सकेनी तs आज ले काहें लोग के लोग चूस-चूस के बर्बाद कइनी?" 
आज तS लेखपाल साहब हीरो बनल रहन। लेकिन ऊ जवान के बात के जवाब उनकरा पास ना रहे. मने मन भगवान से बिनती कइलन की एकरा के उनकर प्रायसचित मान लेस. लेकिन का अतना काफी रहे?
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लेखक परिचय:-

नाम - प्रशान्त पाण्डेय 
पता: ४, गुलटेरिया अपार्टमेंट,
७ क्लाइव रोड,
सिविल लाइन्स,
इलाहाबाद (उ. प्र.)-211001 
संपर्क सूत्र: 84000-33003

अंक - 44 (8 सितम्बर 2015)

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