संपादकीय

त भोजपुरी गीत-संगीत बे पेनी के हो गइल बा!!!

एक दिन के बात बतावत बानी। फिलिम लाइन से जुड़ल एगो दोस्त हमरा से मिले आइल रहन। खासतौर से भोजपुरी फिलिमन खातिर गीत लिखे के प्रति उनकर ढ़ेर लगाव रहे। भोजपुरी गीत आ संगीत प खूब चरचा-परिचरचा भइल। एह चरचा में भोजपुरी गीतन के स्तर में हो रहल गिरावट प जम के सकारात्मक बहस भइल। नयका भोजपुरी गीत के भटकाव प हमार बात सुन के ओह मित्र के तनी मरिचा लागल बाकिर अनमना मन से ऊ मनलन की एह घरी भोजपुरी गीत आपन राह भटक रहल बा। 
जब हमार प्रोफेशनल इयार हमरा इहां से चल गइलन त हमहूँ एह दिशा में खूब सोचनी। आखिर का बात बा कि भोजपुरी गीत-संगीत के ऊँ स्थान नइखे मिलत, जवन बाकी भासा के गीत आ संगीत के मिल रहल बा। का साँचहूं के हमनी के गीत-संगीत में फूहड़ता हावी हो गइल बा? का साँचहूँ में भोजपुरी के लगे अबहीं के समय में गिनावे खातिर निमन गीत नइखे? का साँचहूँ में भोजपुरी के पहचान संकट में बा? एह तरह के ना जाने कइगो सवाल हमरा मन में उमड़े-घुमड़े लागल। एही समुन्द्र मंथन में हमार मन हमरा के बचपन के दिनन में ले गइल अउर फ्लैश बैक स्टोरी एक-एक क के चले लागल। 
हमरा इयाद बा कि गाँव में हरेक परब-त्योहार पर गीत गावल जाव। चाहे जाता से गेहूँ पीसे के बात होखे चाहे ओखल में धान कुटे के बात। घर के मेहरारू लोग एगो गजब के आनंद देवे वाला लय में गीत गावत आपन काम करत लउक जात रहे लोग। सिलवट्टा प मसाला पिसत अपना माई के गीत गावत हम सुनले रहीं। अतने ना जब गाँव मं खेत में धान के रोपाई होखे आ ओकरा के रोपे खातिर बनहारिन आवसन, ऊहों गीत गावसन। हमनी के ओकनी के झूमत देह आ काँदों-माटी से भरल-पूरल खेत में धान के बीया रोपत देखी जा। बड़ी मनोरम दृश्य रहे। हम त खेत में एही से जात रहीं कि हमरा ओकनी के गीत बहुते नीक लागत रहे। एही तरे सोहनी के बेरो गीत गावत सोहनिहार के देखे के मिल जात रहे। 
गाँव-घर के लइकियन में गीत के डायरी रखे के एगो आदत-से रहे। हमरा इयाद बा कि हमार दीदी मोट-मोट डायरी में ना जाने केतना गीत लिखले रहे। शिवजी, पार्वती जी, पीड़िया गीत, देवी गीत, बियाह गीत, झूमर, सोहर ना जाने केतना खंदा में ऊ आपन गीतन के बंटले रहे। का मजाल की केहू दीदी के गीत के डायरी के पन्ना फाड़ लेव। घर में तुफान आ जात रहे। गीत के लेके गाँव के लइकियन में एगो गजब के आकर्षण रहे। गोबर्धन पूजा के बाद (माने गोधन कुटइला के बाद) महीना भर लाउडस्पीकर लगा के रात-रात भर पीड़िया गीत गावे खातिर लइकियन में होड़ लागत हम देखले बानी। 
भोजपुरिया क्षेत्र में छठी माई, काली माई, शिवजी आ पार्वती जी के गीत के त परंपरा रहले बा ओकरा संगे-संगे बियाह गीतन के जवन परंपरा इहवां देखे के मिलेला ऊ शायदे कहीं अउर होई... हरेक भाव के जतावे खातिर गीत के सहारा लीहल गइल बा। लइका के तिलक चढ़े से लेके कोहबर में जाए तक, विदाई से लेके दउरा में डेग डाले तक गीत के विधान बा। चाहे ऊ परछावन के गीत होखे, द्वारपूजा के गीत होखे, गुड़हेथी के बेरा होखे चाहे सिंदुरदान के हर नेग के समय ओकर महत्ता के बतावत गीत के विधान बा अउर ओह गीत के सामाजिक महत्व बा। विदाई के समय गीत के माध्यम से माई-बाबूजी ई बतावे के बतावे के प्रयास करेलन कि ऊ आपन जियरा के टुकरा के दान क देले बाड़न। एह से ए बबुनी अब हमार पगड़ी तोहरे हाथ में बा। तू जहवाँ जात बाड़ू उहे तोहार घर हवे। तू ओहिजा जाके अइसन कवनो काम मत करिह की जवना से माई बाबूजी के आपन गरदन झुकावे के पड़े।
भोजपुरी गीत भोजपुरिया संस्कार में एह लेखा मिल-जूल गइल बा जइसे दूध आ पानी। बिना गीत के भोजपुरिया समाज के कवनो संस्कार पूरे ना होला। भोजपुरिया समाज के गीत परंपरा के इतिहास प नजर दौड़ावला प साफ-साफ लउकत बा कि भोजपुरी के लगे गीत के अथाह थाती बा। सोलहो संस्कार, बारहों महीना के हर परब-त्यौहार खातिर गीत-परंपरा बा। हरेक गीत परंपरा के भितरी गइला पर कई तरह के गीत के रूप ऊभर के सामने आवेला। भोजपुरिया समाज के रग-रग में गीत आ संगीत समाइल बा। एहिजा तक कि कथा-कहानियों में गीतात्मकता लउक जाला। अइसन लमहर परंपरा वाला भोजपुरी गीत के बारे में दुनिया एगो भ्रम पाल लेले बिया। दुनिया के नजर में भोजपुरी गीत फूहड़ता आ भौडापन के प्रतीक बन गइल बा। एहिजा सवाल ई उठ रहल बा कि आखिर दुनिया के ई भ्रम काहे भइल कि भोजपुरी गीत के कवनो पेनी नइखे। एह भ्रम के पीछे कवनो ना कवनो कारण त होखबे करी। एह भ्रम के पाछे हमरा ई कारण लउकल कि भोजपुरी अंचल के बाहर जवन भोजपुरी बोलल जा रहल बा चाहे गावल जा रहल बा लोग ओकरे के असली भोजपुरी मान रहल बा। ईहो बात सच बा कि उनका सामने भोजपुरी के थरिया में जवन कुछ खाए के दियायी, ऊ त ओही हिसाब से ओकर सवाद के बड़ाई चाहे बुराई करीहें। भोजपुरी के लेके भ्रम एहि बाजारू थरिया के कारण हो रहल बा। बाजार के महाजन लोग भोजपुरी के थरिया में जवन बोजा-बजका लोगन के खिया रहल बाड़न ओकरा में काली मिर्च में पपीता के बिया जइसन तत्व मिला दीहल गइल बा। पपीता के बिया कबो काली मिर्च के सवाद नइखे दे सकत। ओही तरे बाजार में बिक रहल डूब्लीकेट भोजपुरी रियल भोजपुरी के सवाद कइसे दे सकत बिया। 
भोजपुरी के देश-विदेश में पसरे में भोजपुरी सिनेमा, गीत आ एलबम के अहम योगदान रहल बा। शुरू में शारदा सिन्हा जी के भोजपुरी गायकी( सत्तर के दसक) से भोजपुरी गीतन के जवन कद बढ़ल, धीरे-धीरे उनका बाद के पीढ़ी ओह कद के ना ढ़ो पाइल। ओह जमाना में एलपी रिकॉर्ड होखत रहे। जवना में एक संगे दू गो से बेसी गीत के जारी ना कइल जा सकते रहे। एही से भोजपुरी गीतन के प्रसार ओतना तेजी से ना हो पाइल जेतना तेजी से होखे के चाहीं। अस्सी के दशक में कैसेट निकले लागल जवना में आठ-आठ गो गीत जारी कइल जा सकत रहे। जइसे-जइसे म्यूजिक कंपनी सब टेक्नीकली बरियार होत गइली स ओइसे-ओइसे भोजपुरी गीत आ संगीत प बाजार हावी होत गइल। दू अर्थी गीत लिखे वालन के बाढ़ आ गइल। अइसन नइखे कि पहिले एह तरह के गीत ना लिखात रहे। बाकिर ओकर प्रसार ना रहे एह से एकर समाज प असर ओह रूप में ना लउकत रहे जइसे एह घरी लउक रहल बा। शारदा सिन्हा के परंपरा के भरत शर्मा बहुत हद तक आगे बढ़वलन बाद में मालिनी अवस्थी, विजया भारती जइसन गायक-गायिका लोग एह परंपरा के जिया के रखले बा। बाकिर जे बालेश्वर के परंपरा के गायक भइल ऊ बालेश्वर के ठीक से ना समझ पइलस अउर धीरे-धीरे भोजपुरी गीत ( जवन बाजार में बा) के स्तर के रसातल में ले के चल गइल। सर्वानंद ठाकुर, गुड्डू रंगीला, राधे श्याम रसिया जइसन लोग एह परंपरा में आगे अइलन अउर जल्दी नाम कमाए के चक्कर में भोजपुरी गीत के संगे अइसन कुकर्म कइलन की ओह दाग के मिटावे में भोजपुरी गीत के सदियों गुजर जाई। एही तरे भोजपुरी फिलिम में विनय बिहारी, श्याम देहाती जइसन लोग अपना गीतन में अइसन-अइसन शब्दन के प्रयोग कइल, जवना के भोजपुरिया सभ्य समाज कबो स्वीकार नइखे क सकत। 
एही तरह जब भोजपुरी गीतन के विडियों बने लागल त गीत के कंटेंट भुला के लोग चोली प कैमरा के फोकस जादा करे लगलन। आज स्थिति ई हो गइल बा कि बिना चोली देखवले कवनो गीत के शूंटिंगे पूरा भइल मुश्किल बा। एह समस्या के जड़ में कारण ई बा कि भोजपुरी फिलिम बनावे वाला लोग भोजपुरी संस्कार आ संस्कृति से बहुत दूर बाड़न। उनका मालूमे नइखे कि भोजपुरिया मिठास का होला। एह बात प हमार कुछ फिलिम बनावे वालन से बात भइल रहे। ओह लोगन के तर्क ई रहे कि भोजपुरी में त गाड़ी देवे के परंपरा बा। बाकिर ओह लोगन के के बतावो कि गारी देवे के जवन परंपरा बा ओकर सामाजिक महत्व केतना बा। जालेक ले केहूं भोजपुरिया संस्कृति के ठीक से ना समझी ओकरा ईहे भ्रम रही की भोजपुरी संस्कृतिए में फूहड़पन बा। खैर, अब समय आ गइल बा कि देश-दुनिया के रियल भोजपुरी से जान-पहचान करावल जाव। अउर डूब्लीकेट भोजपुरी के बाजार से बाहर कइल जाव। अर्थशास्त्र के ई नियम ह कि खोटा सिक्का खरा सिक्का के चलन से बाहर क देला। आज भोजपुरी-गीत संगीत के साथहूं इहे हाल बा। बाजार में खोटा सिक्का के चलन बढ़ गइला से खरा सिक्का लउकल कम हो गइल बा। एह स्थिति खातिर मन थोर करे जगहा खरा सिक्का के चलन में ले आवे के प्रयास कइल जाव त ऊ दिन दूर नइखे जब भोजपुरी के हरिअर खेत सगरो देश-विदेश में शान से लहलहाई।
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लेखक परिचय:-

नाम: आशुतोष कुमार सिंह
बेवसाय: संचालक, स्वस्थ भारत अभियान 
संपादक, स्वस्थ भारत डॉट इन 
दिल्ली
अंक - 46 (22 सितम्बर 2015)

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