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बहू - अनिमेष कुमार वर्मा

सुनन्दा घर में क़दम रखले हीं रहली कि सासु आ गइली सामने। सुनन्दा समझ गइली की आज फ़ेन से कुछ हल्ला होखे वाला बा। पिछला कई दिन से इहे त होता। हर बार कवनो नया बहाना होखे। सुनन्दा बियाह के पहिले भी नौकरी करत रहली आ बियाह बादो नौकरी करे के इच्छा बता देहले रही, जेकरा पे उनकर ससुरारी से केहु के कवनो आपत्ती ना रहे। उनकर पति रमेश के भी सहमति रहे आ उ खुश भी भईल रहलें आपन पत्नी के विचार से। दरअसल नौकरी कईल मजबुरीए रहल सुनन्दा खाति। उनकर माई-बाऊजी के उ अकेला संतान रहली, आ उ लोग के एकमात्र सहारा। बाऊजी के पहिले दोकानदारी रहे, जे शरीर जवाब देहला पे बन्द हो हईल रहे, आ कमाई के कवनो दूसर साधन ना रहल। एही चलते बियाह करे में मे भी उ देरी कईली। एकरा पहिले दू-तीन लोग उनकर नौकरी करे वाला बात आ कारण जानके बियाह काट देहले रहे। बाकी रमेश आ उनकर परिवार के बिचार जानके उ निश्चिंत रहली। शुरू के दू-तीन हफ्ता ले सब ठीक रहे। ओकरा बाद छुट्टी ओरा गईल आ नौकरी चालू। जब पहिला तनखाह आईल त उ रमेश के बता के कुछ पईसा बाऊजी के जबरदस्ती दे आईली। बाऊजी बहुत समझाईनी, बाकी सुनन्दा के पता रहे की बियाह में एतना खरचा के बाद अब कुछ बाचल ना रहे। 

धीरे-धीरे बात घर में सभेके पता चलल, उनकर ननद, सास-ससुर सभे के। सभेके के व्यवहार बदले लागल रहे.. जईसे उ ससुराल से पईसा चोरा के दान दे आईल रहली। शुरू में जे लोग उनकर बड़ाई करत ना अघाओ, धीरे-धीरे उनकर हर बात में दोष निकाले लागो। तीन-चार महिना में रमेशो में बदलाव आवे लागल रहे, आ सुनन्दा के आखिरी उम्मीद भी अब डुबे लागल। रमेश के तनखाह में घर चल जात रहे बाकी कुछ बचत ना रहे, एह से उनका से मांगल ठीक ना लागो। पईसा देवे से केहु सीधे मना ना कईलस, बाकी उनकर नौकरी करे के जरूरत पे सवाल उठे लागल। अब रोज घर में कच-कच होखो... सुनन्दा के हर बात पे सवाल उठे लागल रहे। सुबह उठ के खाना बनावला से लेके रात के खाना बनावल भी बहु के फर्ज रहे। सुनन्दा के ननद रश्मि भी नौकरी करस बाकी केहु कबो ना पुछलस की पईसा का करे लु आ का ना। खैर...

आज घर में घुसते सास टोक देहली- हमनी के घर के बहु हऊ तू, कम-से-कम तनकी सा त लेहाज राखs। आस-पड़ोस के लोग कईसन-कईसन बात करताs की हमनी के बहु के कमाई खा तनी सन। उपर से तू कुछो पहीन के निकल जालु बहरी। नौकरी करे के माने इ ना नु भईल की पैंट पहीन के जाईबु। हमनी के घर में ना चली इ कुल। घरो में माथा पे ना आंचल ना दुपट्टा। तहार मायका ना ह ई की जोन मन में आई तू करबु। सुनन्दा चुप-चाप सुनत गईली। अब एगो काम करs जाके साड़ी पहीन लs घरे मेहमान आवे वाला बा लोग दस मिनट में रश्मि के रिश्ता खाति। सुनन्दा आँख के लोर बचावत अपना कमरा में चल गईली। मेहमान लोग आ गईल। बतकही होखे लागल रहे। सुनन्दा साड़ी पहीन के चौका में लागल रहली। आवाज आवत रहे। चाय चढ़ल रहे चुल्हा पे... सासु कहत रहली- हमनी के बहुत लाड़ से पाल-पोस के बड़ कईले बानी सन आपन बेटी के। हमेशा बेटी ना मान के बेटा अईसन प्यार मिलल बा एकरा। रउरे देख लीं की रश्मि के ना हमनी के कबो नौकरी से रोकनी सन ना कबो कवनो कोनो दूसर बात पे, आज के समाज के हिसाब से पहिनावा, रहन-सहन सबमें। चाय खौले लागल रहे आ सुनन्दा उहें खड़ा रही। सास आगे कहली- हमनी के बस इहे कहनाम बा की जईसे हमनी के आपन बेटी के पालले बानी सन ओइसे हीं ससुराल मे बेटी के प्यार आ सम्मान मिलो। अगर बियाह बादो रश्मि नौकरी करे पे राउर सहमति होखो त बता दिहल जाओ। चाय उफन के बस गिरे वाला हीं रहल आ सुनन्दा भावशून्य आँख से देखत रहली। हमनी के कवनों आपत्ति नईखे आवाज आईल, शायद होखे वाली सास के रहल। सुनन्दा चुल्हा बन्द कर देहली, चाय ना गिरल...
----------------------अनिमेष कुमार वर्मा
अंक - 47 (29 सितम्बर 2015)

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