संपादकीय

आहो कान्हा ई का कइलऽ - महेन्द्र मिश्र

आहो कान्हा ई का कइलऽ, आ हो कान्हा ई का कइलऽ।
भूलि गइलऽ बचपन की बात कान्हा, ई का कइलऽ।

बनवाँ कीला में काँट मोरा निकललऽ कान्हा ई का कइलऽ।
तोरा बिनु नइखे रहल जात कान्हा ई का कइलऽ।

फाड़ के पीताम्बर कान्हा लोर मोरा पोछलऽ कान्हा ई का कइलऽ।
प्रीत कइलऽ किरिया धराय कान्हा ई का कइलऽ।

साँवरी सुरतिया तोहरो आँखि से ना उतरे कान्हा ई का कइलऽ।
रहि-रहि जिउआ घबड़ाय कान्हा ई का कइलऽ।

कहत महेन्दर कान्हा सुधियो ना लिहलऽ कान्हा ई का कहलऽ।
तोहरा बिना जियलो ना जाय कान्हा ई का कइलऽ।
अंक - 46 (22 सितम्बर 2015)

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