संपादकीय

आईल का - दिलीप कुमार पाण्डेय

धउरल खडहुल में अईली माई,
चुस चुस पिअ तारे दूध दूनु भाई।
शिकारी लोग पसरले चहु ओर,
घेर के रखीहे शिकारी पूरूब छोर।
ग़म पाई खाडहा निकललस हल,
दउरल उ लगाके आपन पूरा बल।
उडला के ओकरा भईल ज़ोर हाला,
घप से पेट में मरले एक जाना भाला।
देखते-देखते देह होखे लागल लाल,
ख़ुश हो शिकारी ठोकत रहस ताल।
बचवा गुरुही में रहस् लुकाईल,
जोहत जोहत बाट आंख पथराईल।
केङ केहू ओकनी के जाके समझाई,
कुटी कुटी कटा गईली तहनी के माई।
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लेखक परिचय:-
बेवसाय: विज्ञान शिक्षक
पता: सैखोवाघाट, तिनसुकिया, असम
मूल निवासी -अगौथर, मढौडा ,सारण।
मो नं: 9707096238





अंक - 45 (15 सितम्बर 2015)

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