संपादकीय

सम्पादकीय: अंक - 41 (18 अगस्त 2015)

काहे खाती पनरह अगस्त 

पनरह अगस्त आइल अउरी बीत गइल। कुछ लोग देसभक्ति कऽ गाना अउरी नारा खुब जोर-जोर से लगवलें हँ तऽ कुछ लोग गारियो देत रहले हँ कि 69 साल में सरकार कुछू ना कइलस। करोड़न लोग भूखन मर रहल बाड़े तऽ जवान सड़की पर रोजगार खाती धाका खा ताऽ। हमार सवाल बा ए लोगन से कि का ई लोग आज जेङने सरकार गरियावत बा का गुलामी में रहि के गरिया सकते? जवाब उनकरो अउरी सभकर ना होखी। तब काहे खाती एतना छाती पिटल जाता? 
कुछ लोग के सुभाव होला खाली कमी निकालल अ उरी दबा के राजनीति कइल। अ इसन लोग खाली माहौल खराब करे के काम करे लें। परेसानी के बात ई बा कि अइसन लोग ढेर पढल-लिखल होला अउरी लोग उनकरी बात के धियान से सूनबो करेला; ई लोग एही बात क फायदा उठावेला। 
ए बात से हम सहमत बानी कि सरकार अनेकन मोरचन पर ठीक से काम नइखे कऽ पवले पर एगो अउरी बात ई बा बहुत कुछू कइले बे। सभ से बड़ बा कि देस में लोकतंत्र बरिआर हो रहल बा अउरी जिए के आजादी बा। लाख लोगन के चाहला के बादो ई देस खाड़ा बा अ उरी लोग हेल-मेल से रहत बा। ई कम बड़ बात नइखे जब भीतर अउरी बहरी दूनू ओर से घात होखत होखे तऽ। 
हँ ई बात सही बा कि सरकार के बहुत कुछ करे के बा अउरी सरकार कबो करी। लेकिन मए काम खाती सरकार के ओर मूँह बा के देखला से काम ना चली। कुछ जिम्मेदारी हमनीओ के लेबे के परी अउरी कुछ लोग ओ जिम्मेदारी के निभावतो बा। बाकिर जरुरी बा सभ ए बात के बुझो अउरी आगे बढि के आपन कांह बरियार करो। काँहे कि ई काम केवनो सरकार चाहि के भी ना कऽ पाई। 

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