विविध

सपना सुहाना टूट गइल - मृत्युंजय अश्रुज

एगो लइकी कऽ जब बियाह होला तऽ ना जाने केतने सपना सजवले रहेले औरी ओही सपनन के पुरा होखे के साध ले के नईहर से ससुरा जाले बाकिर ससुरा के रंग-ढंग देखि के ओकर मन सगरी साध बुता जाला। जेकर हाथ पकड़ि के औरी जेकरे असरा एगो अनचिन्ह घर में आवे ले जब उहे ओकरा ले ढेर दहेज के मान देबे लागेला तऽ रहल-सहल सगरी दुनिया उजरि जाला। एही बात के मृत्युंजय अश्रुज जी अपनी कबिता से कहत बानी। हर घर कऽ इहे काथा बा ई तऽ ना कहल जा सकेला बाकिर ई समाज एगो बड़ साँच बा कि दहेज खाती लोग लइकीन के जरा देता। काँहा ले ठीक बा भा बाउर हम कुछ ना कहब रउआँं खुदे समझ बुझि लीं।

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रो रो बोले नयनन क कजरा 

कुहूक कुहूक बोले मोरा कंगना 
अइनी केतना सपना सजाके 
साजन हम तोहरे अंगना। 

सुन्दर सुहावन प्यार भरल 
छोटहन सा होई घर हमार 
स्नेह ममता लाढ दुलार से 
गम गम गमकी घर संसार। 

हम होयेब उनका दिल के धडकन 
पिया हमार पूजा प्रधान 
सेवा से सभके मन जीतब 
प्यार बटोरब सांझ बिहान। 

खोजत खोजत कहां भेजल बाबा 
आवते नसीब फूट गइल 
लोभी पिआ के एके ठोकर से 
सगरी सपना टूट गइल। 

घर में कहिओ मिलल ना हमके 
स्नेह दुलार प्यार के झांकी 
घर भर के बस एके बोली 
दहेज रहल सारा बाकी ।

ससुर का चाहीं नोट पुलिंदा 
नया फटफटिया साजन के 
सास ना पैली गहना जेवर 
त मोर चिता सजैहे आंगन में। 

सेवा सबके करत रहनी बाबा
मार गारी सब सहत रहनी 
अब कहां से दींहे सोच 
चुपचाप सब सहत रहनी। 

सेवा कोई का रास ना आइल 
जलावे के सब भइल तैयार 
मिटाके ई जंजाल घर से 
फिर आई दहेज अपार। 

कोई पकडलेस हाथ पांव
कोई मुंहपर रखलेस हाथ 
अगनी हवाले कइलस उहे 
जे फेरा लेले रहे सात। 

मन त कबे से जरते रहे 
तन भी आज लहक गइल 
जेतने हम चीखी चिलाई 
मन दानवन के चहक गइल। 

धरती गूंजल आसमां गूंजल 
सुनके हमार क्रन्दन अपार 
भगवानो कहां अइले बचावे 
सुनके हमार करूण पुकार।

हमरे राउर बहिन बेटिया 
केहू के बहू केहू के बेटी होला 
अबतक ना समझनी भैया 
फेर काहे ई जुलुम होला। 

मिट जाई सब गिला शिकवा 
दहेज से घर भरी कि कम आई 
दहेजे के दुलहिन समझी 
या बेटी के ही बहू बनाई।
-------------मृत्युंजय अश्रुज
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<<<पिछिला                                                                                                                       अगिला>>>

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