विविध

फूहड़ता के लेके खाली भोजपुरी के चर्चा काहे...

हर आदमी के केवनो चीझ के ले के आपन राय होला औरी अपना ओ राय खाती एगो तर्क होला औरी हर तर्क के सही साबित करे खाती कुछ सबूत औरी उदाहरन होला। जब ई सभ एक सुआह होला तऽ ऊ राय सही लागेला। अभय कृष्ण त्रिपाठी 'विष्णु' जी कऽ ई लेख भोजपुरिया संस्कृति में फइलल फूहरपन पर बा। हो सकेला इहाँ के राय से कुछ लोग सहमत ना होखे लेकिन इहाँ के बात ना खाली सुने लायक बे बाकिर बिचार करे लायक बे। खाली दोसरा पर फूहरता खाती दोसी बनावला से काम ना चली। अपनो भीतर झाँके के परी।
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कबो इ सवाल हमरा मन में बारी बारी घुमे बाकि काल पुरान मित्र डॉक्टर ओमप्रकाश जी के सन्देश से फिर से ताजा हो गईल। सवाल जेतना आसान बा जवाब ओतना आसान नइखे काहे से कारन खोजे में सबसे ज्यादा भोजपुरिये के करेजा छलनी होई। कुछ खास लिखला से पहिले हम ई कहे चाहेब कि फूहड़ता के मतलब मनोरंजन ना होला, फूहड़ता के मतलब गारी से भी ना होला अउरी सबसे बड़ बात कोई भी विषय, शब्द या वाक्य फूहड़ ना होला, फूहड़ होला ओकरा के प्रस्तुति करे के ढंग। एकरा के एह तरह से समझल जा सकल जाला कि यदि गारी से फूहड़ता के जोड़ल जाइत त बियाह के समय गारी कबो ना गवाइत। लवंडा (लऊंडा) नाच के भोजपुरी संस्कृति में कबो जगह ना मिलित जेकरा के आज भी लगभग हर वर्ग द्वारा पसंद कईल जाला; ई अलगा बात बा कि आज मनोरंजन के एह विधा पर ग्रहण लग गईल बा। इहो सही बा कि हम मनोरंजन के एह विधा के कबो पसंद ना कइलीं लेकिन ई विधा काफी दिन तक भोजपुरी जगत के मनोरंजन के साधन रहे।
मूल विषय प आये प सबसे बड़ कारन ई समझ में आवेला कि भोजपुरी के फूहड़ता के चर्चा होखला प बाबू लोग खामोश हो जाला जेकर सबसे बड़ वजह ई हो सकेला कि बबुआ लोग के भोजपुरी के असली संस्कृति के ज्ञाने नइखे, एकर एगो वजह इहो हो सकत बा कि अपना पक्ष में कहे खातिर बबुआ लोग के पास बढ़िया साहित्य के अभाव हो। वइसे एकर सबसे बड़ कारन ई बा कि आज कल बबुआ लोग के खुद के भोजपुरिया कहे में लाज आवेला, बतकही करे खातिर केतनो बतकही हो जाये प इ बात में काफी हद तक सच्चाई देखाई दे जाई। अइसन नईखे कि दूसरा भाषा के फूहड़ता के चर्चा ना होखेला, होखेला बाकि ओह चर्चा के आवाज ओह भासा के बढ़िया साहित्य के आगे दब जाला फिर चाहे दादा कोणके के मराठी हो भा फेर पोलसर आ यो यो सिंह के पंजाबी हो। एकर वजह चाहे विषय के प्रस्तुति हो चाहे सामने वाला के पास अपना प्रस्तुति के पक्ष में ठोस तर्क बस उनकर फूहड़ता भारत के परिदृश्य में आ खुद के संस्कृति में पनप ना पाईल।
अइसन भी नईखे कि भोजपुरिया माटी में मजगर साहित्य रचे वाला वीर ना पैदा भईलें। साहित्य जगत से गहरा नाता ना रहला प भी कई गो नाम गिना सकिलें; मुंशी प्रेमचंद, भिकारी ठाकुर, भारतेंदु जी, कबीर दास, तुलसी दास, आचार्य महेन्द्र शास्त्री, गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, जनकवि भोला, घाघ जी, गोपाल शास्त्री दर्शन केशरी (शास्त्री जी आजादी के पहिले आंदोलन के अलख जगावे खातिर भोजपुरी में लेख अउरी कविता लिखी जवन कि ओह दौर में बनारस के एगो अखबार के जरिये लोगन तक पहुँचत रहे बाद में इहाँ के अपन जिंदगी संस्कृत खातिर समर्पित क दिहनि)। एमा से पुरान लोग भोजपुरी संस्कृति खातिर का कइले बा ई बतावे के जरूरत नईखे आ वइसे भी भोजपुरी में फूहड़ता के दौर ८० के दसक के मध्य से शुरू भईल। आ नया लोग काहे खामोश बा एकर जवाब इहे बा की कहे के त आजु के दिन भोजपुरी भाषा संस्कृति के बहुते ठेकेदार लोग बा बाकि जब कुछुओ करे के बात होला त जवाब मिलेला की भोजपुरी लिखत बानी त खुदे प्रकाशित भी कराई आ मुफत में वितरित भी करीं।
१९८५ में मुंबई में एगो मित्र के घरे भोजपुरी फिलिम के बजट बनत रहे आ हीरोइन के मेहनताना में इहो बात के खर्च शामिल करे के बात होत रहे कि हीरोइन जे भी रही ओकरा के प्रोडूसर महाराज के खुस राखे के पड़ी। ई उहे दौर रहे जहवाँ से भोजपुरी सिनेमा के पतन के सुरुआत भईल आ साथ-साथ फूहड़ता के आगाज जवन एक बार शुरू भईल त बस कारवाँ बनत गईल। केहु पइसा खातिर त केहु नाम खातिर आ केहु भेड़चाल में बाकि एकरा में से केहु भी एकर दोष दूसरा पर नाहीं मढ़ सकेला हाँ एतना जरूर भईल कि एह लोग के नादानी से स्तिथि बद से बदतर होत गईल। 
मतलब ई कि फूहड़ता के मतलब मनोरंजन भले ना होखे बाकि मनोरंजन के चक्कर में भोजपुरी में फूहड़ता घुसत गईल आ केहु कुछ ना कर पाईलक्। शायद पइसा के चाह या फिर रसोई चलावे के मजबूरी। एह दौर के विरोध भी ना भईल जेकर कारन शायद ई रहल को समाज अपना मनोरंजन में कुछ नया चाहत रहे आ जब तक लोगन के फूहड़ता के ज्ञान होखित तब तक फूहड़ता कैंसर के लेखा पूरा समाज में फईल चुकल रहे। एकर एगो बड़ कारन ई भी हो सकेला कि ओह समय के भोजपुरी भाषा अउरी संस्कृति के ठेकेदार लोग के आँखि में फूहड़ता से ज्यादा एकरा पीछे पैसा लउके लागल होखे। एह सब के बादो अइसन नईखे कि एकरा के खत्म ना कइल जा सकल जाला? बिलकुल खत्म कईल जा सकल जात बा लेकिन समस्या घूम फिर के आज के युवा पीढ़ी के इर्द गिर्द आ जात बा जेकरा सामने फूहड़ता के बात करे वाला के मुह बंद करे खातिर ना त कोई विषय बा अउरी ना ही समय। 
युवा पीढ़ी के करता धर्ता आ अच्छा साहित्य के चाह राखे वाला एगो नवजवान से जब कहाईल कि भाई खोज करके बता दीं कि बढ़िया साहित्य लिखे वाला के-के बा त नाराज होके कहले रउआ खोजी हम काहे समय बर्बाद करी। मतलब कि पानी के प्यास बा आ पानी के खोज भी नईखे करे चाहत बा लोग, बस भूखल इंसान नियर भात-भात नरियात बा। अइसे में रास्ता हमनिए के बतावे के पड़ी चाहे कुछ अइसन करे के पड़ी कि लोग के मुह अपने आप बंद हो जाव... पर सबसे बड़ यक्ष प्रश्न ई कि बिलाई के गला में घंटी बांधी के।
--------------------------------अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

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