संपादकीय

कइसे कटी जीवन - सुनील चौरसिया "सावन"


किसान के जिनगी बहुते कठिनऽ बा। दिन-रात काम करत बीत जाला तबो जरुरत कऽ सामान ना जुटा पावेला एगो किसान औरी सगरी जिनगी कबो एक बेरा खा तऽ परिवार के जरुरत काटते में कटि जाला। एही बात के सुनील चौरसिया 'सावन' जी अपनी गीत से बतावे क परियास करत बानी। 
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भइल पांच बिगहा खेत्ते मे गेहूँ एक मन।
अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

बाटे बेटी के बिआह ए पंचे एही सालि
न निम्मन गेहूँ भईल न तेलहन-दालि।।

हालि-चालि का पुछतानी बानी बेहाल ।
मन करता जान दे दीं डुबि पोखरी-ताल।।

जरता चिन्ता के चिता मे दिन-राति तन-मन।
अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

फीसि बाटे बाकी बाबुआ पढे नाहीं जात बा।
पोल्हा के भेजतानी त पिटात खेदात बा।।

सोचले रहनी गेहूँ बेचि के जमा करम फीसि।
गुरू जी उतारम नाहीं लइकवा पे रीसि।।

सोचल बतिया भईल ना ए भईया 'सावन'।


अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

कइलस मौसम उपदरो भइल जीनगी में अन्हार।
किसानन से मजाक कइलस बेसरम सरकार।।

दुख-दरिया मे डुबि मुअने अन्नदाता अनेक।
खुस होके सरकार दिहलसि साठि रुपिया के चेक।।

ए नेताजी! मरेदीं बा मुअले निम्मन।
अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

खेतिए मे जिनगी बीतवनी ए भइया!
लागि जाला खेतिए में खेती के रुपइया।।

बहरा जाएके कब्बो मिलल नाहीं सांस।
खाली बाटे हाथ पइसा बाटे नाहीं पास।।

उपास रहे के परी आई कहाँ से भोजन।
अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

दवा -दारू में गहना बेचि देले बिया मेहरी।
छौ महिन्ना पहिलवें से खाली बाटे डेहरी।।

हे हरी! हे महंगाई मे मरि जइहें किसान।
जवने अन्नदाता के अन्न से जीअता जहान।

ओही अन्नदाता के घर मे घुसल मरन।
भइल पांच बिगहा खेत्ते मे गेहूँ एक मन।
अब रउरिए बताईं कइसे कटी जीवन।।

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लेखक परिचय:-


नाम: सुनील चौरसिया "सावन"
काम: रजत एवं स्वर्ण पदक विजेता, चित्रकार
पता: अमवा बाजार , रामकोला, कुशीनगर ,उ.प्र.
मो: 9044974084


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