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जेठ कऽ दुपहरी - अभिषेक यादव

जेठ कऽ दिन रहे। आ जग्गू कऽ पोखरी पानी से लबालब उपरछत रहे। गरई आ सिधरी कs ठेकाने मत पूछीं! जग्गू एगो सीधा-सादा डबल चालीसा पार अपना घर के अगोरिया रहलें। पनुआ, पोखर, ककरी, ई ३ चीज कs जिम्मा जग्गू अपना लगे राँखस आ बकिया घर-परिवार के।
ओही गाँव के मनबढ लइका भर तवाई चरवाही करस आ ओही पोखरी पs चऊवन के पानी पियावे सऽ। ई बात गते-गते ओह जग्गू के आँख कऽ किरकिरी हो गइल आ बेचारु आग-पानी होके अगिला दिने पोखरी में गोबर घोर दिहलें। कहल जाला कि ‘अबर पs जबर’ बाकिर ‘जबर पs अबर’ का करी?
अगिला दिने जब ओहि जून बेरा पs आपन-आपन गोरु लेके बबुआ लो आइल लो तs गोरु दुरे से कतराए लगले आ डहक-डहक कs के एने-ओने छितरा गइले।
चरवाहन के जब ई पता चलल तs ‘ओठ दबावत’ ‘कऊवा हंकनि कs रुप’ धके चल दिहले (‘अखरे बात, बखरे ना’)। ‘बात कऽ तs बतंगङ’ हो गईल!'
साँझ कs बेरा सभे चरवाहा गुट बना के ई विचार कइल कि कइसे ओह जग्गूआ के अंगुरियावल जाए कि लाइन पs आ जाए!
रात कs इग्यारह बजल चार-पाँच लो हाथ में सोटा लिहले आ ओह जग्गू के पनुआ आ काकर पs लुझि गइलें। हिरामन तs पसेरी-पसेरी भर के पनुआ अइसे नोंचस जइसे चील्ही कs जनम छोडावत होंखस। लहे-लहे पूरा खेत उपरा गईल, तब घुरहू धोती में गंठिया के पनुआ कान्हे ले लीहले जब २-४ फलांग आगे बढले तब-तक घुरहू के छाती टेघराए लागल।
का देखs तारें कि डेढ-पसेरी के पनुआ खेत के बीचो-बीच नारी में डोलsता।
घुरहू भर अंकवारि दबवले घिसिरावे लगले बाकिर जङ-माथ कs पते ना चले!
जेहीं कुछ देर सुहतात बारे उनका देंहे ठकुआ मार गईल आ हाली-हुली भागत-परात कहले-
'भागs सs रे! ई तs जगुआ हs दरि:दरे से बैर हो गईल।’
आ अगिला दिन से ना जग्गु अगोरी करस, आ ना चरवाह लो चरवाही।


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