संपादकीय

जतावल भी जरूरी बा - डॅा० जौहर शफियाबादी

सालन से भोजपुरिया लोग भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में सामिल करे कऽ माँग कर रहन बाड़े लेकिन सरकार आपन मूँह नइखे खोलत। ए बेरा भोजपुरी के ले के लोगन के मन तरह-तरह के भाव आवत-जात बा अउरी शफियाबादी जी कऽ ई गजल ए बेरा एकदम ठीक जान पर रहल बे।
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लड़ाई हक के बा अपना, जतावल भी जरूरी बा ।
बतावल भी जरूरी बा, बुझावल भी जरूरी बा ।।

कबो ई साँप बहिरा ना सुनी कवनो मधुर भाषा ।
कड़क छिंउकी आ पैना से जगावल भी जरूरी बा ।।

खड़ा तुफान में होके बचावे के पड़ी टोपी ।
घड़ी भर माथ के अपना झुकावल भी जरूरी बा ।।

सही अक्षर के खातिर मश्क करहीं के पड़ी बाबू ।
बनावल भी जरूरी बा, मिटावल भी जरूरी बा ।।

बतावल बा इहे दर्शन से दर्शन जिन्दगानी के ।
उगावे खातिर अपना के, डूबावल भी जरूरी बा ।।

कबो जौहर ना देखस कोरा सपना दिन में कवनो ।
एही से आज उनका के घटावल भी जरूरी बा।।
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