संपादकीय

भोजपुरी अउरी आठवी अनुसूची में शामिल भइला से पहिले के काम

आज़ादी के ६८ साल बादो जदि भोजपुरी के आठवी अनुसूची में, चाहे भारत के पटल पर अगर उचित इज्जत नइखे मिलल त ओकरा पीछे सबसे बड़का कारण भोजपुरिया लोगन के एकता कऽ कमी बा। एगो पुरान कहावत बा कि पूर्वांचल में पाँच आदमी एक संगे तब चलेला जब पाँचवा आदमी अरथी पर लेटल होखे। आज जियरा में बहुते खुशी होला जब आज के जुवा पीढ़ी के हम भोजपुरी खातिर समर्पित देखेनी चाहे जुवा पीढ़ी के भोजपुरी में बोलत, पढ़त औरी लिखत देखनी। आज देस विदेस हर जगह से लोग अपना माई-भाखा भोजपुरी ला कुछ ना कुछ करत बा। आज कई गो संगठन, कई गो पत्रिका, अनेकन जगह से अनेकन लोगन के समूह चाहत बा कि कइसे अपना माई भाखा भोजपुरी के हम उचित इज्जत दियवावल जा सके।

कुछ जानकर लोगन के नजर में आज भोजपुरी उ हर मापदंड के पूरा करे वाला भाखा बे जवन आठवीं अनुसूची में शामिल होखे ल चाही। लेकिन धरातल पर का बा तेनी हमनी के सोचे के परी? आज जदि रउरा कवनो बुक स्टाल पर जाके १० गो भोजपुरी के किताब खोजेम त ना मिली। भोजपुरी साहित्य भी आसानी से कही ना मिलेला अउरी जेवन बा उ बहुत कम बा। हमनी के सब केहु के अन्दर भोजपुरी साहित्य के प्रति प्रेम अउरी भोजपुरी भाखा के सम्मान ला भाव जगावे के कोशिश करे के चाही। ना ज्यदा त कम से कम अपना हर जतरा के घरी भी जदि भोजपुरिया लोग एगो भोजपुरी कऽ किताब खरीदे कऽ पढे लागसऽ त भोजपुरी किताबन क मांग बढी जाई।  

कवनो भाखा कऽ मूल्यांकन ओकरा समृद्धिशाली साहित्य से होला अउरी हमनी के भोजपुरी साहित्य के इतिहास अउरी वर्तमान दुनु गर्व करे लायक बा। बस थोरी जरूरत बा कि ऊ साहित्य लोगन के आसानी से मिल जाओ। हम त सब केहु से कहेनी कि अगर रउरा लगे भोजपुरी के कुछ धरोहर धइल बा त ओकरा के परियास कऽ के  लोगन के सोझा ले आईं। जदि रउरा आज कवनो भी भोजपुरी से सम्बन्धीत चीज इनटरनेट पर खोजब त ओकरा सम्बन्धीत जवन रउरा उतर मिली उ दुखःद बा। 

आज भोजपुरी में गाना बजाना के स्तर दिन प्रतिदिन गीरत जात बा। हर ओरी द्विअर्थी गाना लिखात बा, लोग गावत आ लोग सुनत बाड़े। एहपर सबसे पहिले रोक लगावला के काम बा। भोजपुरी के स्वच्छ बनावला के काम बा। कवनो भी समाज में बुराई करे वाला के संख्या कम अउरी बुराई सहे वाला के संख्या जियादा होला। बुराई सहे वाला चुप रहे लागेला एही से बुराई करे वालन केऽ हौसला बुलन्द हो जाला। ई त हर पीढ़ी के जिम्मेवारी होला कि उ अपना आवे वाला पीढ़ी के कुछ बेहतर धरोहर आ बेहतर परिवेश दे के जाये। हमनी के बेरी त हमनी के पुरखा पुरनिया से चाहे हमनी के पहिलका पीढ़ी से निमन ही परिवेश मिलल रहे लेकिन हमनी के का कइले बानी जा चाहे का करत बानी जा कि आज ई हाल हो गइल बा। 
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लेखक परिचय:- 

दिल्ली
ई-मेल:- merichaupal@gmail.com
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