संपादकीय

संपादकीय: अंक - 30 (2 जून 2015)

साहित्य भेद-भाव करे वाला ना होला औरी नाही भेद-भाव करे वाला होखे चाहीं। ऊ तऽ अदिमी होला जे भेद-भाव करेला। जदि साहित्य भेद-भाव करत नजर आवे तऽ ई साहित्य के कमजोरी ना देखावेला बल्कि साहित्यकार के कमजोरी देखावेला। ओही तरे साहित्य के बंटवारा जाति औरी धरम के नाम पर ना हो सकेला। साहित्य तऽ बस साहित्य होला। औरी कुछु ना। जदि एकर बंटवारा होखत लऊके तऽ ई साहित्यकार के वजह से होला। लेकिन सङही साहित्य में सही के सही औरी गलती के गलती के गलती कहे के हिम्मत औरी जोर दुनु होखे के चाहीं।
अंक - 30 (2 जून 2015)
-----------------------------------------------------------------------------

<<< पिछिला                                                                                                                          अगिला >>>

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.