संपादकीय

अंक - 30 (2 जून 2015)

साहित्य भेद-भाव करे वाला ना होला औरी नाही भेद-भाव करे वाला होखे चाहीं। ऊ तऽ अदिमी होला जे भेद-भाव करेला। जदि साहित्य भेद-भाव करत नजर आवे तऽ ई साहित्य के कमजोरी ना देखावेला बल्कि साहित्यकार के कमजोरी देखावेला। ओही तरे साहित्य के बंटवारा जाति औरी धरम के नाम पर ना हो सकेला। साहित्य तऽ बस साहित्य होला। औरी कुछु ना। जदि एकर बंटवारा होखत लऊके तऽ ई साहित्यकार के वजह से होला। लेकिन सङही साहित्य में सही के सही औरी गलती के गलती के गलती कहे के हिम्मत औरी जोर दुनु होखे के चाहीं।

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का लिखी कुछ बुझाते नइखे? - जलज कुमार अनुपम 
का लिखी कुछ बुझाते नइखे ?
लइका के जन्म लिखी
कि लड़की के मरण लिखी
बाप के मुह के आगी लिखी
कि दहेज के दानव के दागी लिखी 
का लिखी कुछ बुझाते नइखे ?
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हे पत्थर के मूरति - रसिक बिहारी ओझा 'निर्भीक'
भगवान के मूरति!
नीमन बा एह जमाना में
तूँ चुपचाप
मंदिर में बइठल रहऽ
टुकुर-टुकुर ताकत रहऽ
घरी घंटा बाजत रहे
जल ढरकत रहे
भोग लागत रहे
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