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झम झमाझम - गुलरेज़ शहज़ाद

झम झमाझम रतिया उतरल
बाकिर ई का?
आँख घवाहिल
पपनी पर पपनी बइठवले
झंखत बिया
चुरमुर करत
सुखल झूर पत्ता के जइसन
कांच कुंवर सपना सभे उड़ल
केहू आपन मुंह तनि खोले
कुछ तs बोले
कवन जतन अब कइल जाए
बिधना के करिखा पोंछाए

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लेखक परिचय:-

कवि एवं लेखक
चंपारण(बिहार)
E-mail:- gulrez300@gmail.com

अंक - 21 (31 मार्च 2015)

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