संपादकीय

जनकवि भोला जी के पाँचगो कबिता


भोला जी आम आदमी के कबि हवीं। उहाँ के आम आदमी जीवन से जुड़ल बिषयन पर कबिता लिखले बानी। परसतुत पाँचगो कबिता ओइसने कबिता बाड़ी स। पाँचों कबिता के बिसय आम आदमी औरी ओकर भाव बा। पहिली कबिता ‘तोहरा नियर केहू ना हमार बा’ में कबि आम आदमी के आपन तकदीर बदले खाती बोलावत बाड़े। दुसरकी कबिता 'जान जाई त जाई' दृढ़ निशचय के बारे में बे। तिसरकी कबिता 'आज पूछता गरीबवा' मेंआवाम के दाशा के देखावत बाड़े। चौथी कबिता 'जनसंगीत' में जनजीवन आम भाव दर्शावत बाड़े औरी पाँचवी कबिता 'जनवाद के आवाज' में भी जनता के भाव दरसावत बाड़े।
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तोहरा नियर केहू ना हमार बा


तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा॥



मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से


तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा॥


हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा॥


देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार ब॥


दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे


छोडि़ जा दुनिया आव लागत ई आसार बा 
तोहरा नियर केहू ना हमार बा॥

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जान जाई त जाई


जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी॥


रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी॥


बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी॥


साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी॥

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आज पूछता गरीबवा


कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा


बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी॥

करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा


जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवन॥
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा


माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवंनी॥
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा॥

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जनसंगीत


हम चहनी, चाहींला, चाहत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी॥

तोहरे पिरितिया के याद में जिनिगिया
निंदवा में अइतू सुनइती हम गीतिया

कहां चल जालू निंदवा में खोजत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी॥

दिन रात के बाड़ू हो तू ही दरपनवा
जवरे पिरितिया के गाइला हो गनवा॥

काहे जनबू ना जान जनावत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी॥

ना देखती कउनो हम कबो सपनवा
शहीदन के हउवे ई प्यारा जहनव॥

अब कउनो ना डर बा जानत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी

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जनवाद के आवाज


आवऽता दहाड़ते 
जनवाद के आवाज
ना चलल बा ना चली
सामंती ई राज
जन-जन के त्याग शक्ति
ना करी अब कउनो भक्ति
घर गांव जवार के नारा बा
जाति ना साथिये दुलारा बा
ना रही कनहूं हत्यारा
जन जीवने बा प्यारा
बस इहे बा नारा, इहे बा नारा
सभे बा प्यारा, प्यारा, प्यारा।

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अंक - 14 (10 फरवरी 2015)

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